Sanskrit Subhashitani (संस्कृत सुभाषितानि)

Subhashita means good speech. They are wise sayings, instructions and stories, composed in Sanskrit language.
Subhasitas act as teacher in formulating the sense of morality and character, which sums up the total of a person’s virtues including dispositions, behaviors, habits, likes, dislikes, capacities, traits, ideals, ideas, values, feelings, and intuitions.

Image of Subhasitani

यावद्वित्तोपार्जनसक्तः तावन्निजपरिवारो रक्तः। पश्चाज्जीवति जर्जरदेहे वार्तां कोऽपि न पृच्छति गेहे॥

भावार्थ :

जब तक व्यक्ति धनोपार्जन में समर्थ है, तब तक परिवार में सभी उसके प्रति स्नेह प्रदर्शित करते हैं परन्तु अशक्त हो जाने पर उसे सामान्य बातचीत में भी नहीं पूछा जाता है ।

धॄतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः । धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम् ॥

भावार्थ :

धर्म के दस लक्षण हैं - धैर्य, क्षमा, आत्म-नियंत्रण, चोरी न करना, पवित्रता, इन्द्रिय-संयम, बुद्धि, विद्या, सत्य और क्रोध न करना ।

नलिनीदलगतजलमतितरलम् तद्वज्जीवितमतिशयचपलम्। विद्धि व्याध्यभिमानग्रस्तं लोक शोकहतं च समस्तम् ॥

भावार्थ :

जीवन कमल-पत्र पर पड़ी हुई पानी की बूंदों के समान अनिश्चित एवं अल्प है। यह समझ लो कि समस्त विश्व रोग, अहंकार और दु:ख में डूबा हुआ है ।

चित्तोद्वेगं विधायापि हरिर्यद्यत् करिष्यति । तथैव तस्य लीलेति मत्वा चिन्तां द्रुतं त्यजेत ॥

भावार्थ :

चिंता और उद्वेग में संयम रख कर और ऐसा मान कर कि श्रीहरि जो जो भी करेंगे वह उनकी लीला मात्र है, चिंता को शीघ्र त्याग दें ।

यथा हि एकेन चक्रेण न रथस्य गतिर्भवेत्। एवं पुरूषकारेण विना दैवं न सिध्यति ॥

भावार्थ :

जिस प्रकार एक पहिये वाले रथ की गति संभव नहीं है, उसी प्रकार पुरुषार्थ के बिना केवल भाग्य से कार्य सिद्ध नहीं होते हैं ।

अभिवादनशीलस्य नित्यं वॄद्धोपसेविनः । चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्या यशो बलम् ॥

भावार्थ :

विनम्र और नित्य अनुभवियों की सेवा करने वाले में चार गुणों का विकास होता है - आयु, विद्या, यश और बल ।

क्रोधो वैवस्वतो राजा तॄष्णा वैतरणी नदी। विद्या कामदुघा धेनुः सन्तोषो नन्दनं वनम् ॥

भावार्थ :

क्रोध यमराज के समान है और तृष्णा नरक की वैतरणी नदी के समान। विद्या सभी इच्छाओं को पूरी करने वाली कामधेनु है और संतोष स्वर्ग का नंदन वन है ।

लोभमूलानि पापानि संकटानि तथैव च। लोभात्प्रवर्तते वैरं अतिलोभात्विनश्यति ॥

भावार्थ :

लोभ पाप और सभी संकटों का मूल कारण है, लोभ शत्रुता में वृद्धि करता है, अधिक लोभ करने वाला विनाश को प्राप्त होता है ।