षड् दोषाः पुरुषेणेह हातव्या भूतिमिच्छता !
निद्रा तद्रा भयं क्रोधः आलस्यं दीर्घसूत्रता:॥किसी व्यक्ति के बर्बाद होने के 6 लक्षण होते है – नींद, गुस्सा, भय, तन्द्रा, आलस्य और काम को टालने की आदत।
There are six symptoms of a person's wasting away: sleepiness, anger, fear, drowsiness, laziness, and the habit of procrastinating.
द्वौ अम्भसि निवेष्टव्यौ गले बद्ध्वा दृढां शिलाम् !
धनवन्तम् अदातारम् दरिद्रं च अतपस्विनम्:॥दो प्रकार के लोगो के गले में पत्थर बांधकर उन्हें समुद्र में फेंक देना चाहिए. पहले वे व्यक्ति जो अमीर होते है पर दान नहीं करते और दूसरे वे जो गरीब होते है लेकिन कठिन परिश्रम नहीं करते।
Two types of people should be tied with stones around their necks and thrown into the sea. The first are those who are rich but don't donate, and the second are those who are poor but don't work hard.
यस्तु सञ्चरते देशान् सेवते यस्तु पण्डितान् !
तस्य विस्तारिता बुद्धिस्तैलबिन्दुरिवाम्भसि ॥वह व्यक्ति जो अलग – अलग जगहों या देशो में घूमता है और विद्वानों की सेवा करता है उसकी बुद्धि उसी तरह से बढती है जैसे तेल का बूंद पानी में गिरने के बाद फ़ैल जाता है।
A person who travels to different places or countries and serves scholars increases his intelligence just as a drop of oil spreads after falling into water.
परो अपि हितवान् बन्धुः बन्धुः अपि अहितः परः !
अहितः देहजः व्याधिः हितम् आरण्यं औषधम् ॥अगर कोई अपरिचित व्यक्ति आपकी सहायता करे तो उसे अपने परिवार के सदस्य की तरह ही महत्व दे वही अगर आपका परिवार का व्यक्ति आपको नुकसान पहुंचाए तो उसे महत्व देना बंद कर दे. ठीक उसी तरह जैसे शरीर के किसी अंग में चोट लगने पर हमें तकलीफ पहुँचती है वही जंगल की औषधि हमारे लिए फायदेमंद होती है।
If a stranger helps you, treat them like a family member. However, if a family member harms you, stop giving them importance. Just as an injury to any part of the body hurts us, a forest medicine is beneficial for us.
येषां न विद्या न तपो न दानं ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः !
ते मर्त्यलोके भुविभारभूता मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति ॥जिन लोगो के पास विद्या, तप, दान, शील, गुण और धर्म नहीं होता, ऐसे लोग इस धरती के लिए भार है और मनुष्य के रूप में जानवर बनकर घूमते है।
Those who lack knowledge, austerity, charity, modesty, virtue, and righteousness are a burden on this earth and roam around like animals in human form.
अधमाः धनमिच्छन्ति धनं मानं च मध्यमाः !
उत्तमाः मानमिच्छन्ति मानो हि महताम् धनम् ॥निम्न कोटि के लोगो को सिर्फ धन की इच्छा रहती है, ऐसे लोगो को सम्मान से मतलब नहीं होता. एक मध्यम कोटि का व्यक्ति धन और सम्मान दोनों की इच्छा करता है वही एक उच्च कोटि के व्यक्ति के सम्मान ही मायने रखता है. सम्मान धन से अधिक मूल्यवान है ।
Lower-class people desire only wealth; they don't care about respect. A middle-class person desires both wealth and respect, whereas a high-class person values only respect. Respect is more valuable than money.
कार्यार्थी भजते लोकं यावत्कार्य न सिद्धति !
उत्तीर्णे च परे पारे नौकायां किं प्रयोजनम् ॥जिस तरह नदी पार करने के बाद लोग नाव को भूल जाते है ठीक उसी तरह से लोग अपने काम पूरा होने तक दूसरो की प्रसंशा करते है और काम पूरा हो जाने के बाद दूसरे व्यक्ति को भूल जाते है।
Just as people forget about the boat after crossing the river, similarly people praise others until their work is completed and forget the other person after the work is done.
न चोरहार्य न राजहार्य न भ्रतृभाज्यं न च भारकारि !
व्यये कृते वर्धति एव नित्यं विद्याधनं सर्वधनप्रधानम् ॥इसे न ही कोई चोर चुरा सकता है, न ही राजा छीन सकता है, न ही इसको संभालना मुश्किल है और न ही इसका भाइयो में बंटवारा होता है. यहखर्च करने से बढ़ने वाला धन हमारी विद्या है जो सभी धनो से श्रेष्ठ है।
Neither can a thief steal it, nor can a king snatch it, nor is it difficult to maintain, nor is it divided among brothers. The wealth that grows by spending it is our knowledge, which is superior to all other wealth.
शतेषु जायते शूरः सहस्रेषु च पण्डितः !
वक्ता दशसहस्रेषु दाता भवति वा न वा ॥सौ लोगो में एक शूरवीर होता है, हजार लोगो में एक विद्वान होता है, दस हजार लोगो में एक अच्छा वक्ता होता है वही लाखो में बस एक ही दानी होता है।
There is one brave man in a hundred, one learned man in a thousand, one good speaker in ten thousand, and only one generous man in a million.
विद्वत्वं च नृपत्वं च नैव तुल्यं कदाचन !
स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान् सर्वत्र पूज्यते ॥एक राजा और विद्वान में कभी कोई तुलना नहीं की जा सकती क्योंकि एक राजा तो केवल अपने राज्य में सम्मान पाता है वही एक विद्वान हर जगह सम्मान पाता है।
There can never be any comparison between a king and a scholar, because a king is respected only in his kingdom, whereas a scholar is respected everywhere.
आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः !
नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति ॥मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु आलस्य है। मनुष्य का सबसे बड़ा मित्र परिश्रम होता है क्योंकि परिश्रम करने वाला कभी दुखी नहीं रहता।
Man's greatest enemy is laziness. Man's greatest friend is hard work, because a hard worker never remains unhappy.
यथा ह्येकेन चक्रेण न रथस्य गतिर्भवेत् !
एवं परुषकारेण विना दैवं न सिद्ध्यति ॥जिस तरह बिना एक पहिये के रथ नहीं चल सकता ठीक उसी तरह से बिना पुरुषार्थ किये किसी का भाग्य सिद्ध नहीं हो सकता।
Just as a chariot cannot move without a wheel, similarly, one's destiny cannot be achieved without effort.
बलवानप्यशक्तोऽसौ धनवानपि निर्धनः !
श्रुतवानपि मूर्खो सौ यो धर्मविमुखो जनः ॥जो व्यक्ति अपने कर्तव्य से विमुख हो जाता है वह व्यक्ति बलवान होने पर भी असमर्थ, धनवान होने पर भी निर्धन व ज्ञानी होने पर भी मुर्ख होता है।
A person who neglects his duty is incapable despite being strong, poor despite being rich, and foolish despite being knowledgeable.
जाड्यं धियो हरति सिंचति वाचि सत्यं !
मानोन्नतिं दिशति पापमपा करोति॥अच्छे दोस्तों का साथ बुद्धि की जटिलता को हर लेता है, हमारी बोली सच बोलने लगती है, इससे मान और उन्नति बढती है और पाप मिट जाते है।
The company of good friends overcomes the complexity of the intellect, our speech becomes truthful, it increases respect and progress, and sins are erased.
चन्दनं शीतलं लोके,चन्दनादपि चन्द्रमाः !
चन्द्रचन्दनयोर्मध्ये शीतला साधुसंगतिः ॥इस दुनिया में चन्दन को सबसे अधिक शीतल माना जाता है पर चन्द्रमा चन्दन से भी शीतल होती है लेकिन एक अच्छे दोस्त चन्द्रमा और चन्दन से शीतल होते है।
Sandalwood is considered the most cooling substance in this world, but the moon is even cooler than sandalwood. But a good friend, the moon and sandalwood, are cooler than each other.
अयं निजः परो वेति गणना लघु चेतसाम् !
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् ॥यह मेरा है और यह तेरा है, ऐसी सोच छोटे विचारो वाले लोगो की होती है. इसके विपरीत उदार रहने वाले व्यक्ति के लिए यह पूरी धरती एक परिवार की तरह होता है।
This is mine and this is yours, such thinking is typical of narrow-minded people. In contrast, for a generous person, the entire earth is like a family.
पुस्तकस्था तु या विद्या, परहस्तगतं च धनम् !
कार्यकाले समुत्तपन्ने न सा विद्या न तद् धनम् ॥किताब में रखी विद्या व दूसरे के हाथो में गया हुआ धन कभी भी जरुरत के समय काम नहीं आते।
Knowledge stored in books and wealth lost to others are never useful in times of need
विद्या मित्रं प्रवासेषु, भार्या मित्रं गृहेषु च !
व्याधितस्यौषधं मित्रं, धर्मो मित्रं मृतस्य च ॥विद्या की यात्रा, पत्नी का घर, रोगी का औषधि व मृतक का धर्म सबसे बड़ा मित्र होता है।
The journey of knowledge, the home of a wife, the medicine of a patient, and the religion of the deceased are the greatest friends.
सहसा विदधीत न क्रियामविवेकः परमापदां पदम् !
वृणते हि विमृश्यकारिणं गुणलुब्धाः स्वयमेव संपदः ॥बिना सोचे – समझे आवेश में कोई काम नहीं करना चाहिए क्योंकि विवेक में न रहना सबसे बड़ा दुर्भाग्य है. वही जो व्यक्ति सोच – समझ कर कार्य करता है माँ लक्ष्मी उसी का चुनाव खुद करती है।
One should never act impulsively, because lack of discretion is the greatest misfortune. Goddess Lakshmi chooses only those who act thoughtfully.
उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः !
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः ॥दुनिया में कोई भी काम सिर्फ सोचने से पूरा नहीं होता बल्कि कठिन परिश्रम से पूरा होता है, कभी भी सोते हुए शेर के मुँह में हिरण खुद नहीं आता।
No work in this world is accomplished by mere thought, but by hard work. A deer never comes into the mouth of a sleeping lion on its own.
विद्यां ददाति विनयं विनयाद् याति पात्रताम् !
पात्रत्वात् धनमाप्नोति धनात् धर्मं ततः सुखम् ॥विद्या हमें विनम्रता प्रदान करती है, विनम्रता से योग्यता आती है व योग्यता से हमें धन प्राप्त होता है और इस धन से हम धर्म के कार्य करते है और सुखी रहते है।
Knowledge gives us humility, humility brings ability, and ability brings wealth. With this wealth, we perform religious deeds and live happily.
माता शत्रुः पिता वैरी येन बालो न पाठितः !
न शोभते सभामध्ये हंसमध्ये बको यथा ॥जो माता – पिता अपने बच्चो को पढ़ाते नहीं है ऐसे माँ – बाप बच्चो के शत्रु के समान है, विद्वानों की सभा में अनपढ़ व्यक्ति कभी सम्मान नहीं पा सकता वह वहां हंसो के बीच एक बगुले की तरह होता है।
Parents who do not educate their children are like enemies to their children. An illiterate person can never gain respect in a gathering of scholars; he is like a heron among swans.
सुखार्थिनः कुतोविद्या नास्ति विद्यार्थिनः सुखम् !
सुखार्थी वा त्यजेद् विद्यां विद्यार्थी वा त्यजेत् सुखम् ॥सुख चाहने वाले को विद्या नहीं मिल सकती है वही विद्यार्थी को सुख नहीं मिल सकता, इसलिए सुख चाहने वालो को विद्या का और विद्या चाहने वालो को सुख का त्याग कर देना चाहिए।
A person who seeks pleasure cannot attain knowledge, and a student cannot attain happiness. Therefore, those who seek pleasure should renounce knowledge, and those who seek knowledge should renounce happiness.
यथा ह्येकेन चक्रेण न रथस्य गतिर्भवेत् !
एवं परुषकारेण विना दैवं न सिद्ध्यति ॥रथ कभी एक पहिये पर नहीं चल सकता हैं उसी प्रकार पुरुषार्थ विहीन व्यक्ति का भाग्य सिद्ध नहीं होता।
Just as a chariot can never move on one wheel, similarly, the destiny of a person without effort is not fulfilled.
बलवानप्यशक्तोऽसौ धनवानपि निर्धनः !
श्रुतवानपि मूर्खोऽसौ यो धर्मविमुखो जनः ॥जो व्यक्ति कर्मठ नहीं हैं अपना धर्म नहीं निभाता वो शक्तिशाली होते हुए भी निर्बल हैं, धनी होते हुए भी गरीब हैं और पढ़े लिखे होते हुये भी अज्ञानी हैं ।
Those who are not diligent and do not fulfill their duties are weak despite being powerful, poor despite being rich, and ignorant despite being educated.
चन्दनं शीतलं लोके ,चन्दनादपि चन्द्रमाः |
चन्द्रचन्दनयोर्मध्ये शीतला साधुसंगतिः ॥चन्दन को संसार में सबसे शीतल लेप माना गया हैं लेकिन कहते हैं चंद्रमा उससे भी ज्यादा शीतलता देता हैं लेकिन इन सबके अलावा अच्छे मित्रो का साथ सबसे अधिक शीतलता एवम शांति देता हैं।
Sandalwood is considered the coolest ointment in the world, but it is said that the moon provides even more coolness. But above all, the company of good friends provides the greatest coolness and peace.
अयं निजः परो वेति गणना लघु चेतसाम् |
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् ॥तेरा मेरा करने वाले लोगो की सोच उन्हें बहुत कम देती हैं उन्हें छोटा बना देती हैं जबकि जो व्यक्ति सभी का हित सोचते हैं उदार चरित्र के हैं पूरा संसार ही उसका परिवार होता हैं।
The thinking of those who think of mine and yours gives them very little and makes them small, whereas those who think of everyone's welfare and are generous in nature, the whole world is their family.
अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम् |
परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम् ॥महर्षि वेदव्यास ने अपने पुराण में दो बाते कही हैं जिनमें पहली हैं दूसरों का भला करना पुण्य हैं और दुसरो को अपनी वजह से दुखी करना ही पाप है ।
Maharishi Ved Vyasa stated two things in his Puranas: doing good to others is virtuous, and causing others suffering is sinful.
उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगा:॥सिर्फ इच्छा करने से उसके काम पूरे नहीं होते, बल्कि व्यक्ति के मेहनत करने से ही उसके काम पूरे होते हैं। जैसे सोये हुए शेर के मुंह में हिरण स्वयं नहीं आता, उसके लिए शेर को परिश्रम करना पड़ता है।
One's work is not accomplished just by wishing, but it is only when a person works hard that his work is accomplished. Just like a deer does not come into the mouth of a sleeping lion on its own, the lion has to work hard for it.
योगस्थः कुरु कर्माणि संगं त्यक्त्वा धनंजय ।
सिद्धयसिद्धयोः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥इस श्लोक में भगवान श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि हे धनंजय! तू आसक्ति को त्यागकर, सफलताओं और विफलताओं में समान भाव लेकर सारे कर्मों को कर। ऐसी समता ही योग कहलाती है।
In this verse, Lord Shri Krishna tells Arjuna that O Dhananjay! You should do all your work by abandoning attachment and taking equal feelings towards success and failure. Such equality is called yoga.
बुद्धिर्बलं यशो धैर्यं निर्भयत्वमरोगता।
अजाड्यं वाक्पटुत्वं च हनुमत्स्मरणाद्भवेत्॥हनुमान जी के स्मरण से बुद्धि, बल, यश, धैर्य, निर्भयता, आरोग्यता, अजान्यता और वाक्पटुता प्राप्त होती है। हनुमान जी की पूजा से जीवन में साहस, शक्ति और आत्मविश्वास की वृद्धि होती है।
By remembering Hanuman ji, one gets wisdom, strength, fame, patience, fearlessness, health, ignorance and eloquence. Worshiping Hanuman ji increases courage, strength and self-confidence in life.
या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥जो देवी सभी प्राणियों में माता के रूप में विद्यमान हैं, उन्हें बार-बार नमस्कार है। दुर्गा देवी की पूजा से सभी संकटों का नाश होता है और शक्ति की प्राप्ति होती है।
Salutations again and again to the Goddess who exists as the mother of all living beings. Worshiping Goddess Durga eradicates all troubles and gives power.
सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥सभी मंगलों की मंगला, सभी कामनाओं को सिद्ध करने वाली, शरणागत वत्सला, तीन नेत्रों वाली, गौरी, नारायणी, तुम्हें प्रणाम। लक्ष्मी देवी की स्तुति से धन, समृद्धि और सौभाग्य की प्राप्ति होती है।
The most auspicious of all auspicious things, the one who fulfils all wishes, the one who loves those who surrender, the one with three eyes, Gauri, Narayani, I salute you. Worshipping Goddess Lakshmi brings wealth, prosperity and good fortune.
या कुन्देन्दु तुषार हार धवला,या शुभ्रवस्त्रावृता।
या वीणावरदण्डमण्डितकरा,या श्वेतपद्मासना॥जो कुंद के फूल, चंद्रमा और हिम के हार से धवल हैं, जो शुभ्र वस्त्रों से आच्छादित हैं, जिनके हाथों में वीणा और वरदंड है, जो श्वेत कमल पर विराजमान हैं। सरस्वती देवी की स्तुति से विद्या, बुद्धि और ज्ञान की प्राप्ति होती है।
Who is white with garlands of Kunda flowers, moon and snow, who is covered with white clothes, who has Veena and Vardanda in her hands, who is seated on a white lotus. Praising Goddess Saraswati gives knowledge, wisdom and knowledge.
वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥टेढ़ी सूंड वाले, बड़े शरीर वाले, करोड़ों सूर्यों के समान चमक वाले, हे देव! मेरे सभी कार्यों में हमेशा विघ्नों का नाश करें। गणेश जी की पूजा से सभी कार्य बिना किसी बाधा के पूर्ण होते हैं।
With a crooked trunk, a big body, and shining like millions of Suns, O God! Always destroy all obstacles in my work. By worshipping Ganesh Ji, all works are completed without any obstacles.
शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं।
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गं॥शांत रूप, सर्प शय्या पर शयन करने वाले, नाभि में कमल वाले, देवताओं के ईश्वर, समस्त विश्व का आधार, आकाश के समान, मेघ के रंग वाले, शुभ अंगों वाले। विष्णु भगवान की पूजा से जीवन में शांति और स्थिरता की प्राप्ति होती है।
Calm form, one who sleeps on a bed of snakes, one with a lotus in his navel, the God of gods, the foundation of the whole universe, like the sky, cloud-coloured, with auspicious limbs. Worshiping Lord Vishnu brings peace and stability in life.
करचरण कृतं वाक्कायजं कर्मजं वा।
श्रवणनयनजं वा मानसं वापराधम्।
विहितमविहितं वा सर्वमेतत्क्षमस्व।
जय जय करुणाब्धे श्रीमहादेव शम्भो॥हाथ, पैर, वाणी, शरीर, कर्म, श्रवण, नयन, मन से किए गए सभी अपराधों को क्षमा करें। जय करुणामय महादेव शम्भो। शिव भगवान की पूजा से जीवन में शांति, शक्ति और क्षमा की प्राप्ति होती है।
Forgive all the crimes committed by hands, feet, speech, body, deeds, ears, eyes, mind. Jai Karunamay Mahadev Shambho. Worshiping Lord Shiva brings peace, power and forgiveness in life.
रामाय रामभद्राय रामचन्द्राय वेधसे।
रघुनाथाय नाथाय सीतायाः पतये नमः॥राम, रामभद्र, रामचन्द्र, रघुनाथ, सीता के पति को नमस्कार। राम भगवान की पूजा से जीवन में मर्यादा, धर्म और सत्य की प्राप्ति होती है।
Salutations to Ram, Rambhadra, Ramchandra, Raghunath, Sita's husband. Worshiping Lord Ram brings dignity, religion and truth in life.
बुद्धिर्बलं यशो धैर्यं निर्भयत्वमरोगता।
अजाड्यं वाक्पटुत्वं च हनुमत्स्मरणाद्भवेत्॥हनुमान जी के स्मरण से बुद्धि, बल, यश, धैर्य, निर्भयता, आरोग्यता, अजान्यता और वाक्पटुता प्राप्त होती है। हनुमान जी की पूजा से जीवन में साहस, शक्ति और आत्मविश्वास की वृद्धि होती है।
By remembering Hanuman ji, one gets wisdom, strength, fame, patience, fearlessness, health, ignorance and eloquence. Worshiping Hanuman ji increases courage, strength and self-confidence in life.
कस्तूरी तिलकं ललाटपटले, वक्षस्थले कौस्तुभं।
नासाग्रे नवमौक्तिकं, करतले वेणुं करे कङ्कणम्॥ललाट पर कस्तूरी का तिलक, वक्षस्थल पर कौस्तुभ मणि, नासिका पर नया मोती, हाथ में बांसुरी और कंगन। कृष्ण भगवान की पूजा से प्रेम, आनंद और भक्ति की प्राप्ति होती है।
Tilak of musk on the forehead, Kaustubh Mani on the chest, new pearl on the nose, flute and bracelet in the hand. Worship of Lord Krishna brings love, happiness and devotion.
शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं।
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गं॥शांत रूप, सर्प शय्या पर शयन करने वाले, नाभि में कमल वाले, देवताओं के ईश्वर, समस्त विश्व का आधार, आकाश के समान, मेघ के रंग वाले, शुभ अंगों वाले। विष्णु भगवान की पूजा से जीवन में शांति और स्थिरता की प्राप्ति होती है।
Calm form, one who sleeps on a bed of snakes, one with a lotus in his navel, the God of gods, the foundation of the whole universe, like the sky, cloud-coloured, with auspicious limbs. Worshiping Lord Vishnu brings peace and stability in life.
या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥जो देवी सभी प्राणियों में माता के रूप में विद्यमान हैं, उन्हें बार-बार नमस्कार है। दुर्गा देवी की पूजा से सभी संकटों का नाश होता है और शक्ति की प्राप्ति होती है।
Salutations again and again to the Goddess who exists as the mother of all living beings. Worshiping Goddess Durga eradicates all troubles and gives power.
सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥सभी मंगलों की मंगला, सभी कामनाओं को सिद्ध करने वाली, शरणागत वत्सला, तीन नेत्रों वाली, गौरी, नारायणी, तुम्हें प्रणाम। लक्ष्मी देवी की स्तुति से धन, समृद्धि और सौभाग्य की प्राप्ति होती है।
The most auspicious of all auspicious things, the one who fulfils all wishes, the one who loves those who surrender, the one with three eyes, Gauri, Narayani, I salute you. Worshipping Goddess Lakshmi brings wealth, prosperity and good fortune.
या कुन्देन्दु तुषार हार धवला,या शुभ्रवस्त्रावृता।
या वीणावरदण्डमण्डितकरा,या श्वेतपद्मासना॥जो कुंद के फूल, चंद्रमा और हिम के हार से धवल हैं, जो शुभ्र वस्त्रों से आच्छादित हैं, जिनके हाथों में वीणा और वरदंड है, जो श्वेत कमल पर विराजमान हैं। सरस्वती देवी की स्तुति से विद्या, बुद्धि और ज्ञान की प्राप्ति होती है।
Who is white with garlands of Kunda flowers, moon and snow, who is covered with white clothes, who has Veena and Vardanda in her hands, who is seated on a white lotus. Praising Goddess Saraswati gives knowledge, wisdom and knowledge.
वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥टेढ़ी सूंड वाले, बड़े शरीर वाले, करोड़ों सूर्यों के समान चमक वाले, हे देव! मेरे सभी कार्यों में हमेशा विघ्नों का नाश करें। गणेश जी की पूजा से सभी कार्य बिना किसी बाधा के पूर्ण होते हैं।
With a crooked trunk, a big body, and shining like millions of Suns, O God! Always destroy all obstacles in my work. By worshipping Ganesh Ji, all works are completed without any obstacles.
असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय।
मृत्योर्मा अमृतं गमय॥असत्य से सत्य की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर, मृत्यु से अमरता की ओर ले चलो। यह श्लोक हमारे जीवन में सत्य, प्रकाश और अमरता की ओर बढ़ने की प्रेरणा देता है।
Lead us from falsehood to truth, from darkness to light, from death to immortality. This shloka inspires us to move towards truth, light and immortality in our lives.
विद्या ददाति विनयं,विनयात् याति पात्रताम्।
पात्रत्वात् धनमाप्नोति,धनात् धर्मं ततः सुखम्॥विद्या से विनय, विनय से पात्रता, पात्रता से धन, धन से धर्म और धर्म से सुख प्राप्त होता है। यह श्लोक हमें शिक्षा और विनम्रता के महत्व को समझाता है, जिससे हम जीवन में सफलता प्राप्त कर सकते हैं।
Education leads to humility, humility leads to worthiness, worthiness leads to wealth, wealth leads to religion and religion leads to happiness. This shloka explains the importance of education and humility, through which we can achieve success in life.
ॐ सह नाववतु।सह नौ भुनक्तु।
सह वीर्यं करवावहै।
तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥हम दोनों की रक्षा हो, हम दोनों का पालन हो, हम दोनों मिलकर परिश्रम करें, हमारे अध्ययन में तेज हो, हम एक दूसरे से द्वेष न करें। यह शांति मंत्र हमारे जीवन में शांति, समृद्धि और एकता की कामना करता है।
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः,गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात् परब्रह्म,तस्मै श्रीगुरवे नमः॥गुरु ही ब्रह्मा, गुरु ही विष्णु और गुरु ही महेश्वर हैं। गुरु साक्षात् परब्रह्म हैं। इस श्लोक में गुरु की महिमा का वर्णन है, जो हमें सिखाते हैं, मार्गदर्शन करते हैं और हमें सही दिशा में ले जाते हैं।
सर्वे भवन्तु सुखिनः,सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु,मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत्॥सभी लोग सुखी रहें, सभी निरोगी रहें, सभी शुभ देखें और किसी को भी दुःख का सामना न करना पड़े। यह श्लोक हमारे समाज के कल्याण और सुख-समृद्धि की कामना करता है, जिससे हम सभी मिलकर एक बेहतर समाज का निर्माण कर सकें।
अञ्जनानन्दनं वीरं जानकीशोकनाशनम्।
कपीशमक्षहन्तारं वन्दे लङ्काभयङ्करम्॥जो अंजना के पुत्र, वीर, सीता के दुःख को हरने वाले, वानरराज, अक्षकुमार का संहार करने वाले, और लंका को भयभीत करने वाले हैं – ऐसे हनुमान को मैं प्रणाम करता हूँ।
मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये॥जो मन की गति से भी तेज, पवन के समान वेग वाले, इंद्रियों को जीतने वाले, बुद्धिमानों में श्रेष्ठ, पवन पुत्र, वानरों के नेता और श्रीराम के दूत हैं – ऐसे हनुमान जी की मैं शरण लेता हूँ।
बुद्धिर्बलं यशो धर्मं निर्भयत्वं अरोगता।
अजाड्यं वाक्पटुत्वं च हनुमत्स्मरणाद्भवेत्॥श्री हनुमान जी का स्मरण करने से बुद्धि, बल, यश, धर्म, निर्भयता, स्वास्थ्य, वाणी की प्रखरता और निर्भीकता प्राप्त होती है।
कायः कलेवरं दीप्तं महाबलपराक्रमम्।
वायुपुत्रं महावीरं वन्दे रामभक्तं प्रभुम्॥उज्ज्वल शरीर, महान बल और पराक्रम से युक्त, पवनपुत्र, महावीर, और श्रीराम के भक्त प्रभु को मैं वंदन करता हूँ।
अविश्रामं वहेत् भारं शीतोष्णं च न विन्दति ।
ससन्तोष स्तथा नित्यं त्रीणि शिक्षेत गर्दभात् ॥विश्राम लिए बिना भार वहन करना, ताप-ठंड ना देखना, सदा संतोष रखना यह तीन चीजें हमें गधे से सीखनी चाहिए।
जीवितं क्षणविनाशिशाश्वतं किमपि नात्र।
यह क्षणभुंगर जीवन में कुछ भी शाश्वत नहीं है।
मनःशौचं कर्मशौचं कुलशौचं च भारत ।
देहशौचं च वाक्शौचं शौचं पंञ्चविधं स्मृतम्।मन शौच, कर्म शौच, देश शौच और वाणी शौच यह पांच प्रकार के शौच हैं।
जीविताशा बलवती धनाशा दुर्बला मम्।।
मेरी जीवन की आशा बलवती है पर धन की आशा दुर्लभ है।
जीवचक्रं भ्रमत्येवं मा धैर्यात्प्रच्युतो भव।
जीवन का चक्र ऐसे ही चलता है इसीलिए धैर्य ना खोए।
नो चेज्जातस्य वैफल्यं कास्य हानिरितिः परा।
जीवन की विफलता से बढ़कर क्या हानि होगी।
न दाक्षिण्यं न सौशील्यं न कीर्तिःनसेवा नो दया किं जीवनं ते।
ना दान है ना सुशीलता है ना कीर्ति है ना सेवा है ना दया है तो ऐसा जीवन क्या है?
यथा चित्तं तथा वाचो यथा वाचस्तथा क्रियाः !
चित्ते वाचि क्रियायांच साधुनामेक्रूपता ॥साधु जन वही बोलते हैं जो उनके चित्र में होता है और जो उनके चित्र में होता है वही उनकी क्रिया में होता है। ऐसे साधु जन के मन वचन एवं क्रिया में समानता होती है।
यस्तु सञ्चरते देशान् सेवते यस्तु पण्डितान् !
तस्य विस्तारिता बुद्धिस्तैलबिन्दुरिवाम्भसियस्तु सञ्चरते देशान् सेवते यस्तु पण्डितान् !
तस्य विस्तारिता बुद्धिस्तैलबिन्दुरिवाम्भसि॥वह व्यक्ति जो भिन्न-भिन्न देशों में भ्रमण करता है एवं विद्वानों की सेवा करता है ऐसे व्यक्ति की बुद्धि उसी तरह बढ़ती है जैसे तेल की बूंद पानी में फैल जाती है।
शतेषु जायते शूरः सहस्रेषु च पण्डितः !
वक्ता दशसहस्रेषु दाता भवति वा न वा ॥100 लोगों में एक शूरवीर होता है, हजार लोगों में एक पंडित(विद्वान) होता है, 10000 लोगों में वक्ता होता है, लाख लोगों में एक दानी होता है।
दारिद्रय रोग दुःखानि बंधन व्यसनानि च।
आत्मापराध वृक्षस्य फलान्येतानि देहिनाम् ॥दरिद्र रोग दुख बंधन और बताएं यह आत्मा रूपी वृक्ष के अपराध का फल है जिसका उपभोग मनुष्य को करना ही पड़ता है।
निर्विषेणापि सर्पेण कर्तव्या महती फणा।
विषं भवतु वा माऽभूत् फणटोपो भयङ्करः॥सांप जहरीला ना होने पर भी फन जरूर उठाता है, अगर वह ऐसा भी ना करें तो लोग उसकी रीड को जूतों से कुचल कर तोड़ देंगे।
षड् दोषाः पुरुषेणेह हातव्या भूतिमिच्छता !
निद्रा तद्रा भयं क्रोधः आलस्यं दीर्घसूत्रता ॥व्यक्ति के बर्बाद होने के छह लक्षण है- नींद, तद्रा, क्रोध, आलस्य एवं काम को टालने की आदत।
जाड्यं धियो हरति सिंचति वाचि सत्यं !
मानोन्नतिं दिशति पापमपा करोति ॥बुद्धि की जटिलता को हरने वाला अच्छे दोस्तों का साथ है। बोली सच बोलने लगती है, महान और उन्नति पड़ती है तथा पाप मिट जाता है।
उद्यमेन हि सिध्यन्ति, कार्याणि न मनोरथैः।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य, प्रविशन्ति मुखे मृगाः ॥परिश्रम से कार्य सिद्ध होते हैं केवल मनोरथ से नहीं। सोते हुए सिंह के मुख में मृग स्वयं ही प्रवेश नहीं करता, उसे अपना शिकार स्वयं ही करना पड़ता है।
प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः।
तस्मात् प्रियं हि वक्तव्यं वचने का दरिद्रता ॥प्रिय वचन बोलने से सब जन संतुष्ट होते हैं इसलिए प्रिय वचन ही बोले। प्रिया वचन बोलने से कहां दरिद्रता आती अर्थात प्रवचन बोलने से कहीं नहीं मिलता नहीं आती तो प्रिया वचन बोले।
काकचेष्टो बकध्यानी श्वाननिद्रस्तथैव च।
अल्पाहारी गृहत्यागी, विद्यार्थी पञ्चलक्षणः ॥कोई जैसी चेष्टा अगले जैसा ध्यान कुत्ते जैसी निंद्रा तथा कम खाने वाला और ग्रह का त्याग करने वाला यही विद्यार्थी के पांच लक्षण है।
सद्भिरेव सहासीत सद्भिः कुर्वीत सङ्गतिम्।
सद्भिर्विवादं मैत्री च नासद्भिः किञ्चिदाचरेत् ॥सज्जनों के साथ बैठना, सज्जनों के साथ ही संगति करनी चाहिए। सज्जनों के साथ ही विवाद एवं मित्रता करनी चाहिए सज्जनों के साथ कोई व्यवहार नहीं करना चाहिए।
त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत् ।
ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत् ॥कुल के हितार्थ एक का त्याग करना, गाँव के हितार्थ कुल का, देश के हितार्थ गाँव का और आत्म कल्याण के लिए पृथ्वी का त्याग करना चाहिए
भूमे मातर्नि धेहि भा भद्रया सुप्रतिष्ठितम् ॥
हे मातृभूमि! कल्याणकारी बुद्धि से हमें युक्त कर मुझको प्रतिदिन सब विषयों को ज्ञान कराओ ताकि प्रथ्वी की संपत्ति प्राप्त हो।
राष्ट्रं हि रक्षामा ध्रुवाम्, देहमित्याश्रितो वयम्।
राष्ट्र की रक्षा करना हमारा कर्तव्य है, हम इसी पर आश्रित हैं।
राष्ट्रस्य धर्मः सदा रक्षणीयः।
राष्ट्र का धर्म सदैव रक्षा योग्य होता है।
स्वभावो नोपदेशेन शक्यते कर्तुमन्यथा ।
सुतप्तमपि पानीयं पुनर्गच्छति शीतताम् ॥किसी व्यक्ति को आप चाहे कितनी ही सलाह दे दो किन्तु उसका मूल स्वभाव नहीं बदलता ठीक उसी तरह जैसे ठन्डे पानी को उबालने पर तो वह गर्म हो जाता है लेकिन बाद में वह पुनः ठंडा हो जाता है।
अनाहूतः प्रविशति अपृष्टो बहु भाषते ।
अविश्वस्ते विश्वसिति मूढचेता नराधमः ॥किसी जगह पर बिना बुलाये चले जाना, बिना पूछे बहुत अधिक बोलते रहना, जिस चीज या व्यक्ति पर विश्वास नहीं करना चाहिए उस पर विश्वास करना मुर्ख लोगो के लक्षण होते है
यथा चित्तं तथा वाचो यथा वाचस्तथा क्रियाः ।
चित्ते वाचि क्रियायांच साधुनामेक्रूपता ॥अच्छे लोग वही बात बोलते है जो उनके मन में होती है. अच्छे लोग जो बोलते है वही करते है. ऐसे पुरुषो के मन, वचन व कर्म में समानता होती है
षड् दोषाः पुरुषेणेह हातव्या भूतिमिच्छता ।
निद्रा तद्रा भयं क्रोधः आलस्यं दीर्घसूत्रता ॥किसी व्यक्ति के बर्बाद होने के 6 लक्षण होते है – नींद, गुस्सा, भय, तन्द्रा, आलस्य और काम को टालने की आदत
कार्यार्थी भजते लोकं यावत्कार्य न सिद्धति ।
उत्तीर्णे च परे पारे नौकायां किं प्रयोजनम्॥जिस तरह नदी पार करने के बाद लोग नाव को भूल जाते है ठीक उसी तरह से लोग अपने काम पूरा होने तक दूसरो की प्रसंशा करते है और काम पूरा हो जाने के बाद दूसरे व्यक्ति को भूल जाते।
कृतान्तोऽपि सन्नद्धः, क्रोधाग्निना ज्वलति ।
विध्वंसयामि सर्वान्, यदि निहन्तास्मि दुष्टजनम्॥अगर दुष्टों का नाश न किया, तो मेरा गुस्सा पूरी दुनिया को तबाह कर देगा!
"मुखं चन्द्रकान्तं, वदनं मधुरं, नयनं मृगमदकज्जलम्।
हृदयस्य स्पन्दनं प्रिय, त्वयि मम जीवितं समर्पितम्॥"प्रेम में डूबे व्यक्ति का अपने प्रिय से कहना – तेरा चेहरा चांद जैसा है, आंखें हिरण सी, और दिल की धड़कन भी अब तेरे नाम है।
A person in love says to his beloved – Your face is like the moon, your eyes are like a deer, and the beat of my heart is also in your name now.
हससि किं बालक किं विषण्णो, गदगदं वदसि किं नवोदितम्।
अवधीर्य पन्थानमागतः किं, विहससि सर्वं विजित्य लोकम्॥अरे बालक! इतना क्यों हंस रहा है? क्या कोई नया मजेदार किस्सा सुन लिया या कोई मजेदार बात हो गई?
Hey boy! Why are you laughing so much? Did you hear a new funny story or did something funny happen?
विपदः संसारे बहुलाः, दुःखकथा च नित्यं।
करुणामयि मां पालय, भवसागरं तरणाय॥इस संसार में दुख बहुत हैं, हर दिन एक नई तकलीफ। हे करुणामयी मां! मुझे इस सागर से पार लगा दो।
There is a lot of sorrow in this world, every day a new trouble. O compassionate mother! Help me cross this ocean.
कृतान्तोऽपि सन्नद्धः, क्रोधाग्निना ज्वलति।
विध्वंसयामि सर्वान्, यदि निहन्तास्मि दुष्टजनम्॥अगर दुष्टों का नाश न किया, तो मेरा गुस्सा पूरी दुनिया को तबाह कर देगा!
If the evil ones are not destroyed, my anger will destroy the entire world!
न भीतो मरणादस्मि, न भीतो दुष्टसंघातैः।
धर्मरक्षणार्थं, प्राणांस्त्यजामि सायुधः॥मैं न मौत से डरता हूं, न ही दुश्मनों की भीड़ से। धर्म की रक्षा के लिए हथियार उठाकर जान भी दे दूंगा!
I am neither afraid of death nor of the crowd of enemies. I will take up arms and even sacrifice my life to protect religion!
अन्धकारे महाघोरे, निःशब्दे वनमध्यगः।
भीतभीतः प्रधावामि, व्याघ्रस्य गर्जनात्॥गहरे अंधेरे और सन्नाटे भरे जंगल में शेर की दहाड़ सुनकर दिल कांप गया और दौड़ पड़ी जान बचाने!
Hearing the roar of the lion in the deep dark and silent forest, the heart trembled and ran to save life!
रक्तमांसं च भक्षयन्तं, राक्षसं दृष्ट्वा जनाः।
विषण्णमुखाः पलायन्ते, जुगुप्सया विह्वलिताः॥खून-मांस खाते राक्षस को देखकर लोग घबरा गए, घृणा से मुंह फेरकर भाग खड़े हुए!
Seeing the monster eating flesh and blood, people got frightened and ran away in disgust!
आकाशे तारकासङ्घः, जलधौ रत्नानि बहूनि।
किं अद्भुतं जगत्यस्मिन, यत्र विष्णोः सृष्टिरियं॥आकाश में अनगिनत तारे और समुद्र में अनमोल रत्न! इस दुनिया में क्या-क्या अद्भुत नहीं है, जो भगवान विष्णु ने रचा!
Countless stars in the sky and priceless gems in the sea! What all is not wonderful in this world, which Lord Vishnu has created!
शान्तमात्मानं चिन्तय, विश्वमिदं क्षणभङ्गुरम्।
सर्वं त्यक्त्वा सुखं वस, नास्ति शाश्वतमिदम्॥अपने मन को शांत रखो, ये दुनिया पल भर में बदल जाती है। सब छोड़कर सुख से रहो, क्योंकि कुछ भी सदा रहने वाला नहीं।
Keep your mind calm, this world changes in a moment. Leave everything and live happily because nothing will last forever.
पापान्निवारयति योजयते हिताय गुह्यं निगूहति गुणान् प्रकटीकरोति ।
आपद्गतं च न जहाति ददाति काले सन्मित्रलक्षणमिदं प्रवदन्ति सन्तः ॥जो पाप से रोकता है, हित में जोडता है, गुप्त बातों को गुप्त रखता है, गुणों को प्रकट करता है, आपत्ति आने पर छोडता नहीं, समय पर देता है - सज्जन इन्हीं को सन्मित्र के लक्षण कहते हैं ।
One who prevents sin, helps others, keeps secrets secret, reveals good qualities, does not forsake a person in times of trouble and gives help on time - gentlemen call these the characteristics of a good friend.
मूर्खस्य पञ्च चिह्नानि गर्वो दुर्वचनं मुखे ।
हठी चैव विषादी च परोक्तं नैव मन्यते ॥गर्व, मुख में दुर्वचन, हठी स्वभाव, विषाद, और दूसरों का न मानना - ये पाँच मूर्ख के लक्षण हैं ।
Pride, bad words, stubborn nature, sadness and not listening to others - these are the five characteristics of a fool.
निन्दन्तु नीतिनिपुणा यदि वा स्तुवन्तु
लक्ष्मीः स्थिरा भवतु गच्छतु वा यथेष्टम्।
अद्यैव वा मरणमस्तु युगान्तरे वा
न्याय्यात्पथः प्रविचलन्ति पदं न धीराः॥नीति में निपुण मनुष्य चाहे निंदा करें या प्रशंसा, लक्ष्मी आयें या इच्छानुसार चली जायें, आज ही मृत्यु हो जाए या युगों के बाद हो परन्तु धैर्यवान् मनुष्य कभी भी न्याय के मार्ग से अपने कदम नहीं हटाते हैं ।
A man well versed in ethics may criticise or praise him, Lakshmi may come or go as per wish, death may occur today or after ages, but a patient man never moves his steps away from the path of justice.
श्रोत्रं श्रुतेनैव न कुंडलेन, दानेन पाणिर्न तु कंकणेन ।
विभाति कायः करुणापराणां, परोपकारैर्न तु चन्दनेन ।।कानों में कुंडल पहन लेने से शोभा नहीं बढ़ती, अपितु ज्ञान की बातें सुनने से होती है। हाथों की सुन्दरता कंगन पहनने से नहीं होती बल्कि दान देने से होती है। सज्जनों का शरीर भी चन्दन से नहीं बल्कि परहित में किये गये कार्यों से शोभायमान होता है।
Wearing earrings does not enhance beauty, but listening to wise words does. The beauty of hands does not come from wearing bracelets, but from giving charity. The body of gentlemen also becomes beautiful not from sandalwood, but from the work done for the welfare of others.
परो अपि हितवान् बन्धुः बन्धुः अपि अहितः परः।
अहितः देहजः व्याधिः हितम् आरण्यं औषधम्।।यदि कोई अपरिचित व्यक्ति आपकी मदद करें तो उसको अपने परिवार के सदस्य की तरह ही महत्व दें और अपने परिवार का सदस्य ही आपको नुकसान देना शुरू हो जाये तो उसे महत्व देना बंद कर दें। ठीक उसी तरह जैसे शरीर के किसी अंग में कोई बीमार हो जाये तो वह हमें तकलीफ पहुंचती है। जबकि जंगल में उगी हुई औषधी हमारे लिए लाभकारी होती है।
If a stranger helps you, give him the same importance as you give to a family member and if a member of your family starts harming you, then stop giving him importance. Just like if any part of the body gets sick, it hurts us. Whereas the medicine grown in the forest is beneficial for us.
अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविन:।
चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्या यशोबलं।।बड़ों का अभिवादन करने वाले मनुष्य की और नित्य वृद्धों की सेवा करने वाले मनुष्य की आयु, विद्या, यश और बल ये हमेशा बढ़ती रहती है।
The age, knowledge, fame and strength of a person who greets elders and serves elders regularly keep on increasing.
सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात ब्रूयान्नब्रूयात् सत्यंप्रियम्।
प्रियं च नानृतम् ब्रुयादेषः धर्मः सनातनः॥सत्य कहो किन्तु सभी को प्रिय लगने वाला सत्य ही कहो, उस सत्य को मत कहो जो सर्वजन के लिए हानिप्रद है, (इसी प्रकार से) उस झूठ को भी मत कहो जो सर्वजन को प्रिय हो, यही सनातन धर्म है।
Say the truth, but say only the truth that is liked by all. Do not say the truth that is harmful to all. (Similarly) do not say the lie that is liked by all. This is the eternal Dharma.
सत्यस्य वचनं श्रेयः सत्यादपि हितं वदेत्।
यद्भूतहितमत्यन्तं एतत् सत्यं मतं मम्॥यद्यपि सत्य वचन बोलना श्रेयस्कर है तथापि उस सत्य को ही बोलना चाहिए जिससे सर्वजन का कल्याण हो। मेरे (अर्थात् श्लोककर्ता नारद के) विचार से तो जो बात सभी का कल्याण करती है वही सत्य है।
Although speaking the truth is better, one should speak only that truth which is beneficial to all. In my (i.e. the narrator of the verse Narada's) opinion, that which is beneficial to all is the truth.
आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः।
नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति।।व्यक्ति का सबसे बड़ा दुश्मन आलस्य होता है, व्यक्ति का परिश्रम ही उसका सच्चा मित्र होता है। क्योंकि जब भी मनुष्य परिश्रम करता है तो वह दुखी नहीं होता है और हमेशा खुश ही रहता है।
The biggest enemy of a person is laziness, a person's hard work is his true friend. Because whenever a person works hard, he does not feel sad and is always happy.
उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगा:।।व्यक्ति के मेहनत करने से ही उसके काम पूरे होते हैं, सिर्फ इच्छा करने से उसके काम पूरे नहीं होते। जैसे सोये हुए शेर के मुंह में हिरण स्वयं नहीं आता, उसके लिए शेर को परिश्रम करना पड़ता है।
A person's work is completed only when he works hard, his work is not completed just by wishing. Just like a deer does not come into the mouth of a sleeping lion on its own, the lion has to work hard for it.
वाणी रसवती यस्य,यस्य श्रमवती क्रिया।
लक्ष्मी : दानवती यस्य,सफलं तस्य जीवितं।।जिस मनुष्य की वाणी मीठी हो, जिसका काम परिश्रम से भरा हो, जिसका धन दान करने में प्रयुक्त हो, उसका जीवन सफ़ल है।
The person whose speech is sweet, whose work is full of hard work, whose wealth is used in charity, his life is successful.
यथा ह्येकेन चक्रेण न रथस्य गतिर्भवेत्।
एवं परुषकारेण विना दैवं न सिद्ध्यति।।जैसे एक पहिये से रथ नहीं चल सकता। ठीक उसी प्रकार बिना पुरुषार्थ के भाग्य सिद्ध नहीं हो सकता है।
Just as a chariot cannot move with just one wheel, in the same way destiny cannot be achieved without effort.
काग चेष्ठा, बको ध्यानम, श्वान निद्रा तथैव च ।
स्वल्पाहारी, गृहत्यागी, विद्याथीृन: पंच लक्ष्ण : ।।सफलता प्राप्त होने तक एक कौवे की तरह निरंतर प्रयास, एक बगुले की तरह एकाग्रता होना, एक कुत्ते की तरह सोना, कम खाना, और ज्ञान प्राप्त करने के लिए घर का त्याग करने के लिए सदैव तैयार रहना, यह एक विद्यार्थी के पांच गुण हैं।
Continuous effort like a crow until success is achieved, concentration like a heron, sleeping like a dog, eating less, and always being ready to sacrifice home to acquire knowledge, these are the five qualities of a student.
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥कार्य करने पर ध्यान देना चाहिए (कर्म पर ध्यान दें) लेकिन अंतिम परिणामों पर नहीं (अर्थात कर्म के फल पर नहीं)। अगर आप सिर्फ कर्म के फल के बारे में ही सोचते रहेंगे तो आप कुछ भी नहीं कर पाएँगे।
One should focus on doing the work (focus on karma) but not on the end results (i.e. not on the fruits of the action). If you keep thinking only about the fruits of the action, you will not be able to do anything.
उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः ।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः ॥उद्यम से ही कार्य सफल होते हैं, न कि मनोरथों से। ठीक उसी प्रकार जैसे सोए हुए शेर के मुख में हिरण प्रवेश नहीं करता।
Work is successful only through hard work and not through wishes. Just like a deer cannot enter the mouth of a sleeping lion.
कुलस्यार्थे त्यजेदेकम् ग्राम्स्यार्थे कुलंज्येत्।
ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत्॥कुटुम्ब के लिए स्वयं के स्वार्थ का त्याग करना चाहिए, गाँव के लिए कुटुम्ब का त्याग करना चाहिए, देश के लिए गाँव का त्याग करना चाहिए और आत्मा के लिए समस्त वस्तुओं का त्याग करना चाहिये।
One must sacrifice one's own interests for the family, one must sacrifice one's family for the village, one must sacrifice one's village for the country and one must sacrifice everything for the soul.
अश्वस्य भूषणं वेगो मत्तं स्याद गजभूषणम्।
चातुर्यं भूषणं नार्या उद्योगो नरभूषणम्॥तेज चाल घोड़े का आभूषण है, मत्त चाल हाथी का आभूषण है, चातुर्य नारी का आभूषण है और उद्योग में लगे रहना नर का आभूषण है।
Fast gait is the ornament of a horse, drunken gait is the ornament of an elephant, cleverness is the ornament of a woman and being engaged in industry is the ornament of a man.
क्षणशः कणशश्चैव विद्यां अर्थं च साधयेत्।
क्षणे नष्टे कुतो विद्या कणे नष्टे कुतो धनम्॥प्रत्येक क्षण का उपयोग सीखने के लिए और प्रत्येक छोटे से छोटे सिक्के का उपयोग उसे बचाकर रखने के लिए करना चाहिए, क्षण को नष्ट करके विद्याप्राप्ति नहीं की जा सकती और सिक्कों को नष्ट करके धन नहीं प्राप्त किया जा सकता।
Every moment should be used to learn and every smallest coin should be used to save it, knowledge cannot be acquired by wasting moments and wealth cannot be obtained by wasting coins.
अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्।
उदारचरितानां तु वसुधैवकुटम्बकम्॥"ये मेरा है", "वह उसका है" जैसे विचार केवल संकुचित मस्तिष्क वाले लोग ही सोचते हैं। विस्तृत मस्तिष्क वाले लोगों के विचार से तो वसुधा एक कुटुम्ब है।
Only narrow minded people think of thoughts like "this is mine", "that is his". According to the broad minded people, the world is a family.
अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविन:।
चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्या यशोबलं।।बड़ों का अभिवादन करने वाले मनुष्य की और नित्य वृद्धों की सेवा करने वाले मनुष्य की आयु, विद्या, यश और बल ये हमेशा बढ़ती रहती है।
The age, knowledge, fame and strength of a person who greets elders and serves elders regularly keep on increasing.
यथा ह्येकेन चक्रेण न रथस्य गतिर्भवेत्।
एवं परुषकारेण विना दैवं न सिद्ध्यति।।जैसे एक पहिये से रथ नहीं चल सकता। ठीक उसी प्रकार बिना पुरुषार्थ के भाग्य सिद्ध नहीं हो सकता है।
Just as a chariot cannot move with just one wheel, in the same way destiny cannot be achieved without effort.
नैनं छिद्रन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावक: ।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुत ॥इस श्लोक का अर्थ है: आत्मा को न शस्त्र काट सकते हैं, न आग उसे जला सकती है। न पानी उसे भिगो सकता है, न हवा उसे सुखा सकती है। (यहां भगवान श्रीकृष्ण ने आत्मा के अजर-अमर और शाश्वत होने की बात की है।)
The meaning of this shloka is: The soul cannot be cut by weapons, nor can fire burn it. Neither water can wet it, nor can the wind dry it. (Here Lord Krishna has talked about the soul being immortal and eternal.)
हतो वा प्राप्यसि स्वर्गम्, जित्वा वा भोक्ष्यसे महिम्।
तस्मात् उत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चय:॥इस श्लोक का अर्थ है: यदि तुम (अर्जुन) युद्ध में वीरगति को प्राप्त होते हो तो तुम्हें स्वर्ग मिलेगा और यदि विजयी होते हो तो धरती का सुख को भोगोगे... इसलिए उठो, हे कौन्तेय (अर्जुन), और निश्चय करके युद्ध करो। (यहां भगवान श्रीकृष्ण ने वर्तमान कर्म के परिणाम की चर्चा की है, तात्पर्य यह कि वर्तमान कर्म से श्रेयस्कर और कुछ नहीं है।)
The meaning of this shloka is: If you (Arjuna) die in the war, you will attain heaven and if you are victorious, you will enjoy the pleasures of the earth... So get up, O Kaunteya (Arjuna), and fight with determination. (Here Lord Krishna has discussed the consequences of present karma, meaning that there is nothing better than present karma.)
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत:।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥इस श्लोक का अर्थ है: हे भारत (अर्जुन), जब-जब धर्म ग्लानि यानी उसका लोप होता है और अधर्म में वृद्धि होती है, तब-तब मैं (श्रीकृष्ण) धर्म के अभ्युत्थान के लिए स्वयम् की रचना करता हूं अर्थात अवतार लेता हूं।
The meaning of this shloka is: O Bharata (Arjuna), whenever there is decline in Dharma i.e., it disappears and unrighteousness increases, then I (Lord Krishna) create myself i.e., take incarnation for the upliftment of Dharma.
परित्राणाय साधूनाम् विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे-युगे॥इस श्लोक का अर्थ है: सज्जन पुरुषों के कल्याण के लिए और दुष्कर्मियों के विनाश के लिए... और धर्म की स्थापना के लिए मैं (श्रीकृष्ण) युगों-युगों से प्रत्येक युग में जन्म लेता आया हूं।
Meaning of this shloka is: For the welfare of the noble men and for the destruction of the evil doers... and for the establishment of Dharma, I (Shri Krishna) have been taking birth in every age since ages.
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥इस श्लोक का अर्थ है: कर्म पर ही तुम्हारा अधिकार है, लेकिन कर्म के फलों में कभी नहीं... इसलिए कर्म को फल के लिए मत करो और न ही काम करने में तुम्हारी आसक्ति हो। (यह श्रीमद्भवद्गीता के सर्वाधिक महत्वपूर्ण श्लोकों में से एक है, जो कर्मयोग दर्शन का मूल आधार है।)
The meaning of this shloka is: You have a right over the action itself, but never over the fruits of action... So do not do the action for the fruit and do not be attached to the action itself. (This is one of the most important shlokas of the Srimad Bhagavad Gita, which is the basic foundation of Karmayoga philosophy.)
ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।
सङ्गात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥इस श्लोक का अर्थ है: विषयों (वस्तुओं) के बारे में सोचते रहने से मनुष्य को उनसे आसक्ति हो जाती है। इससे उनमें कामना यानी इच्छा पैदा होती है और कामनाओं में विघ्न आने से क्रोध की उत्पत्ति होती है। (यहां भगवान श्रीकृष्ण ने विषयासक्ति के दुष्परिणाम के बारे में बताया है।)
The meaning of this shloka is: By thinking about subjects (things), a person gets attached to them. This gives rise to desire for them and when desires are obstructed, anger is born. (Here Lord Krishna has told about the bad consequences of attachment to subjects.)
क्रोधाद्भवति संमोह: संमोहात्स्मृतिविभ्रम:।
स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥इस श्लोक का अर्थ है: क्रोध से मनुष्य की मति मारी जाती है यानी मूढ़ हो जाती है जिससे स्मृति भ्रमित हो जाती है। स्मृति-भ्रम हो जाने से मनुष्य की बुद्धि नष्ट हो जाती है और बुद्धि का नाश हो जाने पर मनुष्य खुद अपना ही का नाश कर बैठता है।
The meaning of this shloka is: Anger destroys a person's wisdom, i.e. he becomes stupid due to which his memory gets confused. When his memory gets confused, his intelligence gets destroyed and when his intelligence gets destroyed, a person ends up destroying himself.
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जन:।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥इस श्लोक का अर्थ है: श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण यानी जो-जो काम करते हैं, दूसरे मनुष्य (आम इंसान) भी वैसा ही आचरण, वैसा ही काम करते हैं। वह (श्रेष्ठ पुरुष) जो प्रमाण या उदाहरण प्रस्तुत करता है, समस्त मानव-समुदाय उसी का अनुसरण करने लग जाते हैं।
The meaning of this shloka is: Whatever conduct or work a great man does, other people (common people) also do the same conduct and work. Whatever example or proof he (the great man) presents, the entire human community starts following him.
श्रद्धावान्ल्लभते ज्ञानं तत्पर: संयतेन्द्रिय:।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति॥इस श्लोक का अर्थ है: श्रद्धा रखने वाले मनुष्य, अपनी इन्द्रियों पर संयम रखने वाले मनुष्य, साधनपारायण हो अपनी तत्परता से ज्ञान प्राप्त कते हैं, फिर ज्ञान मिल जाने पर जल्द ही परम-शान्ति (भगवत्प्राप्तिरूप परम शान्ति) को प्राप्त होते हैं।
The meaning of this shloka is: The men having faith, the men having control over their senses, the men being devoted to sadhana, attain knowledge with their readiness, then after getting the knowledge, they soon attain supreme peace (the supreme peace in the form of attainment of God).
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच:॥इस श्लोक का अर्थ है: (हे अर्जुन) सभी धर्मों को त्याग कर अर्थात हर आश्रय को त्याग कर केवल मेरी शरण में आओ, मैं (श्रीकृष्ण) तुम्हें सभी पापों से मुक्ति दिला दूंगा, इसलिए शोक मत करो।
Meaning of this verse is: (O Arjun) abandoning all religions i.e. every shelter and come to Me alone, I (Shri Krishna) shall free you from all sins, so do not grieve.
ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः ।
भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ।
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाग्ँसस्तनूभिः ।
व्यशेम देवहितं यदायुः ।"हे देवो, हम अपने कानों से शुभ सुनें, अपनी आँखों से शुभ देखें, अपने अंगों को स्थिर रखकर स्तुति करें, और देवताओं द्वारा दिए गए अपने जीवन को अच्छी तरह से व्यतीत करें।"
"O gods, let us hear the auspicious with our ears, see the auspicious with our eyes, sing praises keeping our limbs steady, and spend well our lives given by the gods."
स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः ।
स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः ।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः ।
स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥इंद्र जिनकी महिमा महान है, हम पर कल्याण प्रदान करें, पूषन जो सर्वज्ञ हैं, हम पर कल्याण प्रदान करें, तार्क्षय जो सुरक्षा चक्र हैं, हम पर कल्याण प्रदान करें, बृहस्पति (भी) हम पर कल्याण प्रदान करें, ॐ, शांति, शांति, शांति।
May Indra whose glory is great, bless us, may Pushan who is omniscient, bless us, May Tarkshya who is the protective wheel, bless us, may Brihaspati (also) bless us, Om, peace, peace, peace.
ॐ असतो मा सद्गमय ।तमसो मा ज्योतिर्गमय ।
मृत्योर्मा अमृतं गमय ।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥हे ईश्वर, मुझे असत्य से सत्य की ओर ले चलो। अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो। मृत्यु से अमरता की ओर ले चलो ।
O God, lead me from falsehood to truth. Lead me from darkness to light. Lead me from death to immortality.
ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः। सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु। मा कश्चित् दुःख भागभवेत्॥सभी सुखी हों, सभी रोगमुक्त हों, सभी का कल्याण हो, कोई भी दुखी न हो ।
May everyone be happy, may everyone be disease free, may everyone be well, may no one be sad.
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं, पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय, पूर्णमेवावशिष्यते॥वह (परमात्मा) पूर्ण है, यह (सृष्टि) पूर्ण है। पूर्ण से पूर्ण उत्पन्न होता है। पूर्ण का पूर्ण लेकर, पूर्ण ही शेष रहता है ।
He (God) is perfect, this (creation) is perfect. Perfect is born from perfect. By taking the perfect from the perfect, only the perfect remains.
ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु।
सह वीर्यं करवावहै।
तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै॥हम दोनों (गुरु और शिष्य) एक दूसरे की रक्षा करें, हम दोनों एक साथ आनंद लें, हम दोनों मिलकर महान कार्य करें, हमारा ज्ञान तेजस्वी हो, हम दोनों कभी एक दूसरे से द्वेष न करें ।
May both of us (Guru and disciple) protect each other, may both of us enjoy together, may both of us do great work together, may our knowledge be radiant, may both of us never hate each other.
वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥हे विशाल शरीर वाले, सूर्य के समान तेजस्वी, वक्रतुण्ड (गणेश जी), मेरे सभी कार्यों को हमेशा बिना विघ्न के पूरा करें।
O huge bodied one, radiant like the Sun, Vakratunda (Ganesh Ji), always complete all my tasks without any hindrance.
शुभं करोति कल्याणं आरोग्यं सुख संपदा।
शत्रु बुद्धि विनाशाय दीप ज्योति नमोस्तुते॥जो शुभ करता है, कल्याण, आरोग्य, सुख, और संपदा लाता है, और शत्रुओं की बुद्धि का नाश करता है, उस दीपक की ज्योति को नमस्कार।
Salutations to the flame of that lamp which does auspiciousness, brings well-being, health, happiness, and wealth, and destroys the wisdom of the enemies.
अहमेवासमेवाग्रे नान्यद्यत् सदसत् परम्।
पश्चादहं यदेतच्च योऽवशिष्येत सोऽस्म्यहम् ॥ ॥1॥श्री भगवान कहते हैं - सृष्टि से पूर्व केवल मैं ही था। सत्, असत् या उससे परे मुझसे भिन्न कुछ भी नहीं था। सृष्टि न रहने पर (प्रलय काल में) भी मैं ही रहता हूँ । यह सब सृष्टि रूप भी मैं ही हूँ और जो कुछ इस सृष्टि, स्थिति तथा प्रलय से बचा रहता है, वह भी मै ही हूँ ।
Lord says - I only existed in the beginning ( before any creation) . There was neither manifest nor un-manifest or anything beyond both which is other than me . I am all which is visible . Whatever remains after annihilation is also me.
ऋतेऽ र्थं यत् प्रतीयेत न प्रतीयेत चात्मनि।
तद्विद्यादात्मनो मायां यथाऽऽभासो यथा तमः ॥ 2 ॥जो मुझ मूल तत्त्व के अतिरिक्त (सत्य सा) प्रतीत होता(दिखाई देता) है परन्तु आत्मा में प्रतीत नहीं होता (दिखाई नहीं देता), उस अज्ञान को आत्मा की माया समझो जो प्रतिबिम्ब या अंधकार की भांति मिथ्या है
Whatever appears to be substantial besides me , has no reality in itself. Know this ignorance as m y illusory power Maya. It is unreal l ike a reflection or darkness.
यथा महान्ति भूतानि भूतेषूच्चावचेष्वनु।
प्रविष्टान्यप्रविष्टानि तथा तेषु न तेष्वहम् ॥ 3 ॥जैसे पंचमहाभूत (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश) संसार के छोटे-बड़े सभी पदार्थों में प्रविष्ट होते हुए भी उनमें प्रविष्ट नहीं हैं, वैसे ही मैं भी सबमें व्याप्त होने पर भी सबसे पृथक् हूँ।
As five universal elements(earth, water, fire, air and space) perva de everything in the universe and at the same time they exist without them; similarly, I also perva de everything I create and at the same time I exist without them.
एतावदेव जिज्ञास्यं तत्त्व जिज्ञासुनाऽऽत्मनः।
अन्वयव्यतिरेकाभ्यां यत् स्यात् सर्वत्र सर्वदा ॥ 4 ॥आत्म-तत्त्व को जानने की इच्छा रखने वाले के लिए इतना ही जानने योग्य है कि अन्वय (सृष्टि) अथवा व्यतिरेक (प्रलय) क्रम में जो तत्त्व सर्वत्र एवं सर्वदा( स्थान और समय से परे) रहता है, वही आत्मतत्त्व है ।
A person willing to know the supreme t ruth, should only know that whatever exist eternally( beyond time ) and everywhere( beyond space ) , during the pr ocess of creation and annihilation is the ultimate truth .
यस्य पुत्रो वशीभूतो भार्या छन्दानुगामिनी । विभवे यश्च सन्तुष्टः तस्य स्वर्ग इहेव हि ॥
जिसका पुत्र उसके वश है, पत्नी आज्ञानुसार चलती हो, और वैभव से जो संतुष्ट है, उसके लिए तो यहीं स्वर्ग है ।
For one whose son is under his control, The wife follows orders, and who is satisfied with his wealth, this is heaven for him.
अर्थागमो नित्यमरोगिता च प्रिया च भार्या प्रियवादिनी च । वशश्च पुत्रोऽर्थकरी च विद्या षड्जीवलोकस्य सुखानि राजन् ॥
हे राजन् ! अर्थोपार्जन, अरोगित्व, अच्छी लगनेवाली और प्रिय बोलनेवाली पत्नी, अपने आधीन पुत्र, और अर्थकरी विद्या – ये छे जीवलोक के सुख है ।
O king! Earning money, health, a good-looking and loving wife, a son under your control, and knowledge of the economy – these are the six happiness of the living world.
वनेऽपि दोषा प्रभवन्ति रागिणां गृहेऽपि पञ्चेन्द्रिय निग्रह स्तपः । अकुत्सिते कर्मणि यः प्रवर्तते निवृत्तरागस्य गृहं तपोवनम् ॥
आसक्त लोगों का वन में रहना भी दोष उत्पन्न करता है । घर में रहकर पंचेन्द्रियों का निग्रह करना हि तप है । जो दुष्कृत्य में प्रवृत्त होता नहीं, और आसक्तिरहित है, उसके लिए तो घर हि तपोवन है ।
Living in the forest for people who are attached to attachments also creates faults. Controlling the five senses while living at home is penance. For one who does not indulge in evil deeds and is free from attachments, his home itself is a hermitage.
यथा वायुं समाश्रित्य वर्तन्ते सर्वजन्तवः ।
तथा गृहस्थमाश्रित्य वर्तन्ते सर्व आश्रमाः ॥जिस तरह सब जंतु वायु को आश्रित होते हैं, वैसे सब आश्रम गृहस्थ (आश्रम) पर आश्रित हैं ।
Just as all living creatures are dependent on air, similarly all ashramas are dependent on the grihastha (home).
क्रोशन्तः शिशवः सवारि सदनं पङ्कावृतं चाङ्गणम्
शय्या दंशवती च रुक्षमशनं धूमेन पूर्णः सदा ।
भार्या निष्ठुरभाषिणी प्रभुरपि क्रोधेन पूर्णः सदा
स्नानंशीतलवारिणा हि सततं धिग् गृहस्थाश्रमम् ॥जिस घर में बालक रोते हो, सब जगह पानी गिरा हो, आंगन में कीचड हो, गद्दों में मांकड हो, खुराक रुक्ष हो, धूँए से घर भरा हो, पत्नी निष्ठुर बोलनेवाली हो, पति सदा क्रोधी हो, ठंडे पानी से स्नान करना पडता हो – ऐसे गृहस्थाश्रम को धिक्कार है ।
A house where children cry, water is spilled everywhere, there is mud in the courtyard, there are manure in the mattresses, the food is dry, the house is full of smoke, the wife speaks cruelly, the husband is always grumpy, one has to take bath in cold water – shame on such a household.
सानन्दं सदनं सुताश्च सुधियः कान्ता प्रियभाषिणी
सन्मित्रं सधनं स्वयोषिति रतिः चाज्ञापराः सेवकाः ।
आतिथ्यं शिवपूजनं प्रतिदिनं मिष्टान्नपानं गृहे
साधोः सङ्गमुपासते हि सततं धन्यो गृहस्थाश्रमः ॥घर में आनंद हो, पुत्र बुद्धिमान हो, पत्नी प्रिय बोलनेवाली हो, अच्छे मित्र हो, धन हो, पति-पत्नी में प्रेम हो, सेवक आज्ञापालक हो, जहाँ अतिथि सत्कार हो, ईशपूजन होता हो, रोज अच्छा भोजन बनता हो, और सत्पुरुषों का संग होता हो – ऐसा गृहस्थाश्रम धन्य है ।
Blessed is the household where there is happiness in the home, the son is intelligent, the wife is sweet-spoken, there are good friends, there is wealth, there is love between the husband and wife, the servants are obedient, guests are treated well, God is worshipped, good food is cooked every day and there is the company of good people.
षान्ति तुल्यं तपो नास्ति सन्तोषान्न सुखं परम् ।
नास्ति तृष्णा समो व्याधिः न च धर्मो दयापरः ॥क्षमा जैसा अन्य तप नहि, संतोष जैसा अन्य सुख नहि, तृष्णा जैसा अन्य रोग नहि, दया जैसा अन्य कोई धर्म नहि ।
There is no other penance like forgiveness, there is no other happiness like contentment, there is no other disease like greed, there is no other religion like kindness.
सत्यं तीर्थं क्षमा तीर्थं तीर्थंमिन्द्रियनिग्रहः ।
सर्वभूतदया तीर्थं सर्वत्रार्जवमेवच ॥सत्य, क्षमा, इंद्रियनिग्रह, सर्वत्र सरलता, और सब प्राणियों के लिए दया – ये तीर्थरुप है ।
Truth, forgiveness, control of the senses, simplicity everywhere and compassion for all living beings – these are the form of Tirtha.
स्वभावो नोपदेशेन शक्यते कर्तुमन्यथा । सुतप्तमपि पानीयं पुनर्गच्छति शीतताम् ॥
किसी व्यक्ति को आप चाहे कितनी ही सलाह दे दो किन्तु उसका मूल स्वभाव नहीं बदलता ठीक उसी तरह जैसे ठन्डे पानी को उबालने पर तो वह गर्म हो जाता है लेकिन बाद में वह पुनः ठंडा हो जाता है।
No matter how much advice you give a person, their basic nature doesn't change, just like boiling cold water makes it hot but then cools down again.
अनाहूतः प्रविशति अपृष्टो बहु भाषते । अविश्वस्ते विश्वसिति मूढचेता नराधमः ॥
किसी जगह पर बिना बुलाये चले जाना, बिना पूछे बहुत अधिक बोलते रहना, जिस चीज या व्यक्ति पर विश्वास नहीं करना चाहिए उस पर विश्वास करना मुर्ख लोगो के लक्षण होते है।
Going to places without being invited, talking too much without asking, and trusting people or things you shouldn't trust are all characteristics of foolish people.
यथा चित्तं तथा वाचो यथा वाचस्तथा क्रियाः । चित्ते वाचि क्रियायांच साधुनामेक्रूपता ॥
अच्छे लोग वही बात बोलते है जो उनके मन में होती है. अच्छे लोग जो बोलते है वही करते है. ऐसे पुरुषो के मन, वचन व कर्म में समानता होती है।
Good people speak what is in their mind. Good people do what they say. Such people have consistency in their thoughts, words, and actions.
शिक्षा पर संस्कृत श्लोक उसके हिंदी और अंग्रेजी अर्थ के सहित यहाँ दिया गया है।
Sanskrit shloka on education is given here with its Hindi and English meaning.
विद्यां ददाति विनयं, विनयाद् याति पात्रताम्।
पात्रत्वाद्धनमाप्नोति, धनाद्धर्मं ततः सुखम्॥शिक्षा से विनम्रता आती है, विनम्रता से योग्यता मिलती है।योग्यता से धन प्राप्त होता है, धन से धर्म और फिर सुख।
Education brings humility, humility brings ability. Ability brings wealth, wealth brings religion and then happiness
नास्ति विद्यासमो बन्धुर्नास्ति विद्यासमः सुहृत्।
नास्ति विद्यासमं वित्तं नास्ति विद्यासमं सुखम्॥किसी के लिए विद्या के समान बन्धु नहीं होता, किसी के लिए विद्या के समान सुहृद् नहीं होता। धन के समान विद्या नहीं होती, सुख के समान विद्या नहीं होती॥
For some, there is no friend like education, for some, there is no friend like education. There is no education like wealth, there is no education like happiness.
आयुः कर्म च विद्या च वित्तं निधनमेव च।
पञ्चैतानि विलिख्यन्ते गर्भस्थस्यैव देहिनः॥यह श्लोक हमें बताता है कि जीवन, कर्म, विद्या, धन और मृत्यु जैसी पांच वस्तुएँ हमारे जीवन के आदर्श मूल्यों के साथ जुड़ी होती हैं।
This shloka tells us that five things namely life, karma, education, wealth and death are associated with the ideal values of our life.
विद्याभ्यास स्तपो ज्ञानमिन्द्रियाणां च संयमः।
अहिंसा गुरुसेवा च निःश्रेयसकरं परम्॥विद्याभ्यास, तपस्या, ज्ञान और इंद्रियों के संयम के माध्यम से विद्या प्राप्त की जा सकती है। अहिंसा और गुरु की सेवा ही सर्वोत्तम कार्य है।
Vidya can be acquired through study, penance, wisdom and control of senses.
विद्या नाम नरस्य रूपमधिकं प्रच्छन्नगुप्तं धनम्।
विद्या भोगकरी यशः सुखकरी विद्या गुरूणां गुरुः॥विद्या नाम नर की सबसे बड़ी धन और यश है, जो छिपा हुआ और गुप्त है। विद्या भोगों को प्रदान करने वाली है, यश की प्राप्ति कराने वाली है, विद्या गुरुओं की गुरु है।
Vidya is the greatest wealth and fame of a man, which is hidden and secret. Knowledge provides pleasures, makes one attain fame, Vidya is the Guru of Gurus.
विद्या बन्धुजनो विदेशगमने विद्या परं दैवतम्।
विद्या राजसु पुज्यते न हि धनं विद्याविहीनः पशुः॥विद्या बन्धुओं की सहायता करती है, विदेश यात्रा में मार्गदर्शन करती है, विद्या परम दैवता है। विद्या राजसभा में पूज्य होती है, इसलिए विद्याविहीन पशु की तुलना में धन का महत्व नहीं होता।
Knowledge helps relatives, guides in foreign travel, Vidya is the ultimate divinity. Knowledge is revered in the royal court, hence wealth has no value in comparison to an animal devoid of knowledge.
सुखार्थी त्यजते विद्यां विद्यार्थी त्यजते सुखम्।
सुखार्थिन: कुतो विद्या कुतो विद्यार्थिन: सुखम्॥सुख चाहने वाले को विद्या और विद्या चाहने वाले को सुख त्याग देना चाहिए। सुख चाहने वाले के लिए विद्या कहाँ और विद्यार्थी के लिए सुख कहाँ ।
If you aspire for comforts, leave the knowledge. If you aspire for knowledge, leave the comforts. Aspirant for comforts cannot get knowledge and aspirant for knowledge cannot get comforts.
रूपयौवनसंपन्ना विशाल कुलसम्भवाः ।
विद्याहीना न शोभन्ते निर्गन्धा इव किंशुकाः ॥रुपसंपन्न, यौवनसंपन्न, और चाहे विशाल कुल में पैदा क्यों न हुए हों, पर जो विद्याहीन हों, तो वे सुगंधरहित केसुडे के फूल की भाँति शोभा नहीं देते ।
Even if one is beautiful, youthful and born in a noble family, if he is uneducated, he does not look good like the fragranceless Kesuda flower.
सुखार्थिनः कुतोविद्या नास्ति विद्यार्थिनः सुखम् ।
सुखार्थी वा त्यजेद् विद्यां विद्यार्थी वा त्यजेत् सुखम् ॥जिसे सुख की अभिलाषा हो (कष्ट उठाना न हो) उसे विद्या कहाँ से ? और विद्यार्थी को सुख कहाँ से ? सुख की ईच्छा रखनेवाले को विद्या की आशा छोडनी चाहिए, और विद्यार्थी को सुख की ।
One who desires happiness (does not want to suffer), how can he get knowledge? And where does the student get happiness from? The one who desires happiness should give up the hope of education, and the student should give up the hope of happiness.
अलसस्य कुतो विद्या अविद्यस्य कुतो धनम् ।
अधनस्य कुतो मित्रममित्रस्य कुतः सुखम् ॥आलसी इन्सान को विद्या कहाँ ? विद्याविहीन को धन कहाँ ? धनविहीन को मित्र कहाँ ? और मित्रविहीन को सुख कहाँ ?
Where is education for a lazy person? Where is wealth for one without education? Where is friend for one without money? And where is happiness for one without friends?
उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।
क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति ॥उठो, जागो, वरिष्ठ पुरुषों को पाकर उनसे बोध प्राप्त करो। छुरी की तीक्ष्ण धार पर चलकर उसे पार करने के समान दुर्गम है यह पथ – ऐसा ऋषिगण कहते हैं।‘
Get up, wake up, find elders and gain knowledge from them. This path is as difficult as walking on the sharp edge of a knife and crossing it – this is what the sages say.
न चोरहार्यं न च राजहार्यंन भ्रातृभाज्यं न च भारकारी । व्यये कृते वर्धते एव नित्यं विद्याधनं सर्वधन प्रधानम् ॥
विद्या रूपी धन को कोई चुरा नहीं सकता, राजा नहीं ले सकता, भाईयों में बाँटा नहीं जाता और यह बोझ नहीं लगता। इसे खर्च करने से बढ़ता है और विद्या धन सभी धनों से श्रेष्ठ है।"
No one can steal the wealth of knowledge, no king can take it, it cannot be divided among brothers and it does not become a burden. It increases by spending it and the wealth of knowledge is the best of all wealth."
पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि जलमन्नं सुभाषितम् । मूढै: पाषाणखण्डेषु रत्नसंज्ञा प्रदीयते ॥
यह श्लोक यह सिखाता है कि असली मूल्य और महत्व जल, अन्न और अच्छे वचनों में हैं, न कि दिखावटी चीजों में। मूर्ख लोग अक्सर ऐसी चीजों को महत्व देते हैं जिनमें कोई वास्तविक मूल्य नहीं होता है।
This shloka teaches that the real value and importance lies in water, food and good words, not in superficial things. Foolish people often attach importance to things that have no real value.
धनानि भूमौ पशवश्च गोष्ठे, भार्या गृहद्वारि जनाः श्मशाने । देहश्चितायां परलोक मार्गे, कर्मानुगो गच्छति जीवः एकः ॥
यह श्लोक इस बात पर जोर देता है कि जब व्यक्ति मरता है, तो उसका धन, पशु, और परिवार सब कुछ पीछे रह जाता है। केवल उसके कर्म ही उसके साथ जाते हैं। यह दर्शाता है कि जीवन में जो कुछ भी हम करते हैं, उसके परिणाम हमें परलोक में भी साथ चलते हैं। यह श्लोक हमें अच्छे कर्म करने और अच्छे जीवन जीने के लिए प्रेरित करता है।
Wealth remains on the earth, animals remain in the cattle shed, wife goes to the door of the house and family accompanies till the cremation ground. But when death occurs, the body is on the pyre and the soul travels alone to the other world according to its deeds.
उष्ट्राणां विवाहेषु , गीतं गायन्ति गर्दभाः । परस्परं प्रशंसन्ति अहो रूपं अहो ध्वनिः ll
"ऊँटों के विवाह में गधे गीत गा रहे हैं। वे एक-दूसरे की प्रशंसा कर रहे हैं, वाह रूप! वाह ध्वनि!
विवरण - यह श्लोक इस बात पर व्यंग्य करता है कि कैसे लोग अक्सर बिना योग्यता के दूसरों की प्रशंसा करते हैं, या फिर वे प्रशंसा के योग्य लोगों को पहचान नहीं पाते हैं. यह श्लोक अक्सर उन स्थितियों पर लागू होता है जहाँ लोग आपस में ही प्रशंसा करते हैं, भले ही वे प्रशंसा के योग्य न हों।
"The donkeys are singing songs at the camel's wedding. They are praising each other, wow! Wow! The sound!